यह संसार जिसकी रचना मैं-नही (
प्रकृति ) जो कि मैं ( आत्मा ) द्वारा गर्भित है के माध्यम से हुई है । इसमें
प्रत्येक रूप की प्रकृति द्वारा सृजित गुणों के बल के अधीन उस स्वरूप के अधीन
आत्मा अपना कर्म क्रियांवन धर्म निर्वाह करती है । इन आत्माओं को परम् सत्य अपनी
सक्रीय प्रकृति द्वारा नियंत्रित करते हैं । इस समस्त लीला के गतिमान रहते हुये भी
परम् सत्य का एक भिन्न रूप भी रहता है जो कि इन समस्त लीलाओं से पूर्णतया अ-प्रभावित
रहता है । परम् सत्य संसार की समस्त नियोजित कर्मों को सम्पादन प्रदान करने वाला
है परंतु किसी भी कर्म का कारण नहीं होता है । संसार की प्रत्येक गति को गतिमान
करने वाला है परंतु किसी भी गति से उसका सरोकार नहीं होता है ।
सोमवार, 17 नवंबर 2014
रविवार, 16 नवंबर 2014
परम सत्य स्वरूप
परम् सत्य पारलौकिक, अखण्ड, चिर ब्रम्ह है जो समस्त सृष्टि के आकाश और समय के
चक्र में बँधे रूपों का आधार है । परमात्मा समस्त रूपों में विकीर्त आत्मा है ।
परमात्मा ही समस्त रूपों में निहित आत्मा, प्रकृति की गतिविधियों का
नियंत्रक रूप तथा नये रूपों की उत्पत्ति का नियंत्रक है । वह पाप के अंधकार में
भटकते को ज्ञान का प्रकाश देता है, निर्बल को शक्ति देता है, दु:ख भोगते को शांति और दया देता
है, वह सभी का कल्याण करता है ।
शनिवार, 15 नवंबर 2014
कृष्ण स्वरूप
जो सभी को आकर्षित करते हैं और
अपने भक्तों के हृदय में भक्ति जाग्रित करते हैं वह कृष्ण हैं । उन्हे कृष्ण
इसलिये कहा जाता है क्योंकि वह अपने भक्तों के पाप हर लेते हैं । कृष्ण कृस शब्द
से बना है जिसका अर्थ होता है खुरच कर साफ करना । कृष्ण अपने भक्तों के पाप को
खुरच कर हटा देते हैं जिससे कृष्ण भक्त पाप से मुक्त हो जाता है ।
शुक्रवार, 14 नवंबर 2014
विष्णु स्वरूप
ऋगवेद में विष्णु की महिमा वर्णन
करते हुये कहा गया है कि संसार की रचना करने के बाद वह स्वयं उसमें प्रवेश कर गये
। वह संसार के नियंत्रक हैं और उसी संसार में समाये हुये हैं । विष्णु अपने
अस्तित्व को परम् सत्य में समाहित रूप में रखते हैं ।
गुरुवार, 13 नवंबर 2014
सृष्टि का विज्ञान
परम् सत्य के ही दो रूप, परा – उच्चतर, अपरा – निम्न । परा – आत्मा, अपरा – प्रकृति । आत्मा तथा प्रकृति
निर्मित वस्तु शरीर जिसमें आत्मा को पिरोया दोनों ही परम् सत्य के ही दो रूप हैं ।
निराकार परम् सत्य ने अपने अद्भुद विज्ञान द्वारा अपने को साकार संसार के रूप में
प्रगट किया है । इस संसार की रचना का विचार भी परम् सत्य के मस्तिष्क से उत्पन्न
हुआ है और प्रकृति जिसके माध्यम से संसार को बनाया है वह भी उन्ही की रचना है ।
बुधवार, 12 नवंबर 2014
परस्पर एक साथ
इस संसार की रचना में जहाँ एक ओर
परम् सत्य के मस्तिष्क की कल्पना नें एक साकार रूप धारण किया है वहीं दूसरी ओर
वहीं प्रगट रूपों का संसार परम् सत्य को जानने और उन्ही में समा जाने को उद्यत है
। परम् सत्य ही इस संसार के आदि मध्य और विलय तीनों ही रूप हैं । परम् सत्य ही
ज्ञान प्यार और पूर्णता तीनों ही रूप हैं । इन तीनों रूपों को अलग नही किया जा
सकता है । ब्रम्हा विष्णु और शिव तीनों एक ही रूप हैं मात्र समझने में भिन्न लगता
है ।
मंगलवार, 11 नवंबर 2014
उद्भव, रक्षा, संहार
परम् सत्य ही इस संसार को बनाने
वाले हैं, वह ही इसकी रक्षा भी करते है, और उन्ही
में इस संसार का विलय भी होता है । संसार को बनाने के संदर्भ में उन्हे ही ब्रम्हा
कहा जाता है, रक्षा करने के संदर्भ में उन्हे ही विष्णु कहा जाता
है, और जब सम्पूर्ण सृष्टि ज्ञान से
युक्त हो जाती है तो उन्ही को शिव कहा जाता है । शिव रूप प्राप्त होना ही उनमें
विलय है । ज्ञानी का कोई अलग स्वरूप नहीं रह जाता है ।
सोमवार, 10 नवंबर 2014
सृष्टि की रचना
परम् सत्य ने इस दृष्य संसार को
अपनी प्रकृति द्वारा बनाया और स्वयं उसमें आत्मा के रूप में बैठ गये । वह हम
प्रत्येक के हृदय में विद्यमान हैं । वही प्रकृति के गुणों के भोक्ता हैं । वही
हमारे हृदय में भक्ति भी जागृत करते हैं और वह ही हमारी प्रार्थना भी स्वीकार
करतें हैं । वह ही ज्ञान भी हैं और वह ही ज्ञान का पथ भी हैं ।
रविवार, 9 नवंबर 2014
संतुलन
प्रकृति अर्थात् बाह्य शक्तियों
द्वारा संचालित व्यवस्था । आत्मा अर्थात् अ-परिवर्तनीय का अंश । इन्हीं दोनो का
नियंत्रित परस्पर हर प्रत्येक को साधना है । जो जितना प्रकृति के जाल में उलझेगा उतना
ही तनाव झेलेगा । जो जितना इस प्रकृति की कलाओं को अ-परिवर्तनीय के अंकुश में कर
अपने कार्यों को करेगा उतना ही स्वतंत्रता की शांति का भोग करेगा । यही संतुलन ही
जीवन का लक्ष्य है ।
शनिवार, 8 नवंबर 2014
नियम का शासन
प्रकृति नियम पालन करते हुये
अनुशासित आचरण द्वारा कार्य सम्पादन की व्यवस्था है । प्रकृति की उत्पत्ति परम्
सत्य के मस्तिष्क से निर्धारित योजना के अधीन हुई है । आत्मा परम् सत्य का अंश है
। यह संसार इन्ही दोनो की परस्पर क्रिया का स्थल एवं परिणाम है । इसी परस्पर
क्रिया को यथा अपेक्षा चरितार्थ करना हर प्रत्येक मनुष्य का दायित्व है । समय का
चक्र चलता रहता है । हर कुछ समय के साथ बदलता रहता है । जो जितना इस चक्रपर सही का
चुनाव करते हुये जीवन के कार्यों को करता जावेगा उतना ही सफलता पाता जावेगा ।
शुक्रवार, 7 नवंबर 2014
संघर्ष का संसार
यह संसार अच्छाई और बुराई के बीच
संघर्ष का स्थल है । ईश्वर अपना प्यार हर एक के ऊपर उदारता से बरसाता है । इस
प्यार के सहारे हर प्रत्येक को बुराई को दूर भगा अच्छाई को पाना है । ईश्वर
निर्विवाद अच्छा है और उसका प्यार असीमित है । ईश्वर की शक्ति भी असीमित है ।
परन्तु बुराई को दूर करने के लिये हर प्रत्येक को प्रयत्नशील होना अनिवार्य है ।
ईश्वर जानता तो सभी कुछ है । बुराई पैदा करने वाली परिस्थितियाँ उसके सज्ञान से
परे नहीं होती हैं । फिरभी बुराई से संघर्ष की शुरुआत हर प्रत्येक द्वारा ही
अपेक्षित होती है ।
गुरुवार, 6 नवंबर 2014
स्वतंत्र आत्मा
हर प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा समान
रूप से स्वतन्त्र होती है । चुनाव भिन्न होते हैं इसलिये बुराई सम्भावित तथा घटित
भी होती है । यदि चुनाव की स्वतंत्रता नहीं होगी तो संसार की घटनाये यंत्रवत्
होंगी । यदि आदेशों द्वारा त्रुटि, भद्दगी, और बुराई के शमन की कवायद की जावेगी तो सच्चाई, सुंदरता और अच्छाई की खोज़ समाप्त हो जावेगी । यदि सच्चाई, सुंदरता और अच्छाई को पाना है तो त्रुटि, भद्दगी और बुराई का शमन करना होगा
।
बुधवार, 5 नवंबर 2014
अच्छे बुरे का चुनाव
इस कर्म प्रधान संसार में कर्म का
चुनाव ही सबसे बडा मुद्दा है । ईश्वर को बुराईयों के लिये दोषी नहीं ठहराया जा
सकता है । ईश्वर आदेशों को किसीके ऊपर थोपता नहीं है । चुनाव हर प्रत्येक व्यक्ति
का अधिकार है । परम् सत्य की अंश हर प्रत्येक आत्मा पूर्ण रूप से स्वतंत्र होती है
। प्रकृति सभी को समान रूप से अवसर प्रदान करती है । ईश्वर का लक्ष्य सच्चाई, सुंदरता और अच्छाई का होता है ।
मंगलवार, 4 नवंबर 2014
परम् ब्रम्ह और आत्मा
परम् सत्य अपने मूल स्वरूप में
पवित्र परम् ब्रम्ह हैं । इस सृष्टि के जनक, नियंत्रक, एवं संचालक के रूप में ईश्वर हैं
। परंतु दोनों ही रूपों में वह सृष्टि से भिन्न ही हैं । सृष्टि के संचालन के संदर्भ
में यह आत्मा परम् सत्य की प्रतिनिधि है ।
सोमवार, 3 नवंबर 2014
भागवत् पुराण का मत
परम् सत्य अविभाजित सत्य के रूप
में ब्रम्ह है । यही सत्य समस्त सृष्टि का आधार है । आत्मा उसी पूज्यनीय सत्य का
ही स्वरूप है । परम् सत्य सृष्टि से सर्वथा भिन्न अस्तित्व है । सृष्टि में आत्मा
को परम् सत्य ने अपने प्रतिनिधि के रूप में रखा है । आत्मा का कार्य सम्पादन में, कर्म से अ-प्रभावित, किसी अनुभव से परे, कर्मफल से अ-प्रभावित अपेक्षित
स्वरूप होता है । इसी स्वरूप में यह सृष्टि की संचालक और नियंत्रक हो सकती है
।
रविवार, 2 नवंबर 2014
परम् सत्य और आत्मा
परम् सत्य निरापद, निष्कलुश सृष्टि से परे एक स्वत: अस्तित्व है । उसी परम् सत्य ने अपनी माया
शक्ति द्वारा अपने को समस्त सृष्टि के विभिन्न रूपों में प्रगट किया है । वह संसार
की गतिविधियों से अ-प्रभावित भी रहता है जबकि वह समस्त गतिविधियों का संचालक भी
होता है । आत्मा उसी परम् सत्य का ही अंश स्वरूप होता है ।
शनिवार, 1 नवंबर 2014
मनुष्य चरित्र के दो रूप
उपनिषदों में दो चिडियों का वृतांत
आता है जो एक पेड पर बैठी हैं । इनमें से एक फल को खाती है और दूसरी फल को खाती
नहीं केवल देखती है । यह चरित्र के दो पहलू के दृष्टांत हैं । हम परम् सत्य को किस
रूप में देखते हैं यह चरित्र के विशिष्ट गुण का ज्ञोतक होता है । परम् सत्य को
स्वामी के रूप में और अपने को सेवक के रूप में एक देखने का पहलू है और ईश्वर से
कुछ माँगने के भाव में देखना दूसरा पहलू है ।
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014
परम् सत्य के दो रूप
उपनिषदों में परम् सत्य को जहाँ एक ओर अविभाज्य, निर्विकार, अभेद्य, अ-चिंतनीय बताया है वहीं दूसरी ओर समस्त सृष्टि के
स्वामी और समस्त रूपों का उत्पत्ति श्रोत
भी बताया है । इसके बावज़ूद भी वह गति से रहित है । परम् सत्य समस्त सृष्टि के
मात्र आधार ही नहीं हैं अपितु इसके संचालक भी हैं ।
गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014
श्वेतस्वतरा उपपनिषद के अनुसार
परम् सत्य रूप रहित है परंतु अपनी
माया शक्ति द्वरा समस्त रूपों को जन्म देने वाला है । पूरी ऋष्टि का उद्भव परम्
सत्य से है और अंत में विलय भी उसी में है । हम उस परम् सत्य से विनय करते हैं कि
हमें सत्कर्म करने का विवेक प्रदान करें । उन्हे कोई देख नहीं सकता परंतु जो उन्हे
उपरोक्तानुसार अनुभव करता है, अपने मस्तिष्क में उनके प्रति आदर भाव पैदा करता है, उनको अपने हृदय में स्थिर कर जीवन यापन करता है वह दिव्य शांति को प्राप्त
होता है । परम् सत्य हमारे अंत:करण में ज्योति के समान है ।
बुधवार, 29 अक्टूबर 2014
सर्वभौम सत्य
परम् सत्य समस्त सृष्टि का सृजन-कर्ता
परंतु इन सभी में से कोई नहीं, ना ही वस्तु, ना ही गुण, ना ही बुद्धि, ना ही विवेक, ना ही गति, ना ही जडता, ना ही स्थान और ना ही समय । परम् सत्य स्वयँ अपनी
परिभाषा है । परम् सत्य रूप रहित है । परम् सत्य समय की उत्पत्ति के पूर्व से है ।
मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014
सत्य स्वरूप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण नारद को अपना सत्य रूप बताते
हुये कहते हैं कि मैं अ-दृष्य हूँ, गंध-रहित हूँ, मुझे स्पर्ष नहीं किया जा सकता
है, गुण-रहित
हूँ, मेरी
विभक्ति सम्भव नहीं है, अजन्मा हूँ, शाश्वत्
हूँ, चिर
हूँ, और
क्रिया से च्युत् हूँ |
सोमवार, 27 अक्टूबर 2014
दैविक गतिविधियाँ
परम् सत्य की प्रकृति के साथ
परस्पर क्रिया ही देवता के स्वरूप को जन्म देती है । यह संसार अर्थपूर्ण बन जाता
है । इसकी रक्षा करना इसकी उन्नति करना लक्ष्य बन जाता है ।
रविवार, 26 अक्टूबर 2014
वेद के अनुसार
परम् सत्य अग्नि में है, जल में है, समस्त ब्रम्हाण्ड के कण कण में है, हम उन्हे बारम्बार प्रणाम करते हैं
। यदि वह ना हों तो कौन कुछ कर सके, कौन जीवित रह सके, यह सब तभी सम्भव है जब परम् सत्य
हैं ।
शनिवार, 25 अक्टूबर 2014
तैत्रेय उपनिषद के अनुसार
परम् सत्य वह अस्तित्व है जिससे
समस्त दृष्य जीव पैदा हुये हैं, जिसके सहारे समस्त जीव जीवित हैं, और समस्त जीव मरणोंपरांत जिसमें समाहित हो जाते हैं ।
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014
व्यापक विस्तार
सर्वव्यापी परम् सत्य को जानने के
लिये प्रचलित सांसारिक मानक प्रयोज्य नहीं प्रमाणित होते हैं । इस स्थिति को
विद्वान लोग कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं – निराकार, मस्तिष्क के विचार क्षेत्र से परे, अ-परिवर्तनीय । उसका कोई व्यक्त अस्तित्व नहीं है फिरभी सर्वत्र विद्यमान है
। अविनाशी है फिरभी सभी विनाशशील रूपों में विद्यमान है । इस प्रकार के विरोधाभास
वाले शब्दों का एक साथ प्रयोग करके यह व्यक्त करने का प्रयत्न किया जाता रहा है कि
वह परम् सत्य ही समस्त रूपधारी के अस्तित्व का आधार है । परंतु सबका आधार होते
हुये भी वह स्वयँ किसी अन्य पर आश्रित नहीं है ।
गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014
संतों द्वारा अभिव्यक्ति
गौतम बुद्ध से परम् सत्य का स्वरूप
पूँछे जाने पर शांत मौन द्वारा उन्होने उत्तर दिया था । इसी प्रकार संत जेसुस से
परम् सत्य को पूँछे जाने पर उन्होने भी शांत मौन द्वारा उत्तर दिया था ।
बुधवार, 22 अक्टूबर 2014
मध्यमिका बौद्धमत
यह सम्प्रदाय परम् सत्य को शून्य द्वारा व्यक्त करता
है । इस अभिव्यक्ति का कारण व्यक्त करते हुये बताते हैं कि परम् सत्य को कोई भी
नाम देने से उसके अपरिमित सामर्थ्य को सीमित व्यक्त करने का भय है जो कि भ्रामक
होगा । । इस मतावलम्बियों का कहना है कि इस परम् सत्य को तभी पाया जा सकता है जबकि
सभी द्वैत उस परम् सत्य में विलीन हो जाँय |
मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014
बौद्धमत
निराकार परम् सत्य जिसका कि असत्य
रूप पूरे संसार में फैला है जिसे दुनियाँ जानती है । जो सत्य को खोजने की राह पर
चलता है उनमें जिन्हे सत्य का भास मिलता है वे उसे मौन द्वारा व्यक्त करते हैं ।
जिन्हें सत्य का भास नहीं मिलता वह प्रश्न-उत्तर करते हैं । चर्चा-प्रतिचर्चा से
दूरी / विरक्ति इंगित होती है । चर्चा-प्रतिचर्चा अनउपलब्धि इंगित करती है । प्रचलित
रूपों में कोई वस्तु मूल्य नहीं निहित होता है । इसलिये मौन चर्चा-प्रतिचर्चा की
अपेक्षा उत्तम विकल्प होता है । मौन का रूपांतर भाषण में नहीं किया जा सकता है ।
इसलिये सत्य का अनुभव मिलने पर मूक ही बेहतर अभिव्यक्ति है ।
सोमवार, 20 अक्टूबर 2014
उपनिषदों की अभिव्यक्ति
जब तक ज्ञात संसार और अज्ञात
ब्रम्ह की स्थिति रहती है तभी तक विचार भटकते रहते हैं । जब आत्मा की अनुभूति हो
जाती है तब सोचने और भटकने वाला मस्तिष्क परम् सत्य की अनुभूति में समाहित हो जाता
है । ऐसे में सोचने और भटकने को कुछ रह ही नहीं जाता है । परम् सत्य इतना निखरा
हुआ सत्य है कि हम उसे एक भी नहीं कह सकते क्योंकि एक का भाव भी सांसारिक मानको पर
आधारित है । हम उसे मात्र द्वितियो नास्ति कि उस जैसा कोई दूसरा नहीं अथवा अद्वैत
कहकर व्यक्त करतें हैं । उसे तभी जाना जा सकता है जब सभी द्वैत उस एक में समाहित
हो जाते हैं । ऐसे मे फिर नकारात्मक पथ अपनाते हुये परम् सत्य को व्यक्त किया जाता
है । वह यह नहीं है । वह यह नहीं है ।
रविवार, 19 अक्टूबर 2014
मूक ही अभिव्यक्ति
ब्रम्ह के अनुभव को व्यक्त करने के
सामर्थ्य का अभाव अभिव्यक्त का उपाय ढूढते हुये कभी कहता है, एक अस्तित्व जो कि विशुद्ध और सरल है, तो कभी कहता है कि वह स्वयं विषय
भी है और वस्तु भी है । सत्य स्थिति यह है कि हमारे पास परम् सत्य को व्यक्त करने
के लिये कोई वृतांत नहीं है । इसलिये शाश्वत् मूक ही सबसे सही अभिव्यक्ति है जो कि
हमारे व्यक्त करने की असहायता को प्रगट करने वाली है । परम् सत्य हमारी अभिव्यक्ति
की सीमाओं से परे का अस्तित्व है ।
शनिवार, 18 अक्टूबर 2014
उपनिषदों का मत
उपनिषद जो कि वेदों की व्याख्या हैं का दृढ मत है कि समस्त
सृष्टि का आधार परम् ब्रम्ह है । ब्रम्ह के समान कोई दूसरा नहीं है । ब्रम्ह को
किसी निष्चित गुण से नहीं व्यक्त किया जा सकता है । ब्रम्ह किसी अन्य पर निर्भर
नहीं है । ब्रम्ह किसी अन्य से प्रभावित नहीं होता है । मनुष्य में निहित आत्मा
ब्रम्ह का ही अंश स्वरूप है । आत्मा का अनुभव एक ध्रुव सत्य जिसके अनुसार ज्ञात
संसार और अज्ञात ब्रम्ह के एकीकृत स्वरूप की परिकल्पना है । इसके बावज़ूद भी ब्रम्ह
का अनुभव व्यक्त करने के लिये मनुष्य का अभिव्यक्ति सामर्थ्य अपने को असहाय प्रतीत
करता है|
शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014
सत्य प्रश्नवाचक नहीं
इस परिवर्तनशील संसार में सभी कुछ समय के साथ समाप्त होने
वाला है । किस भी स्वरूप का जन्म हुआ है उसका अंत निश्चित है । इस सत्य के बावज़ूद
भी संसार का एक स्वरूप बना हुआ है । इससे विदित है कि इस संसार के पीछे तथा इस
संसार के अंदर भी कोई ऐसा अपरिवर्तनीय सत्य भी निहित है जो कि समय के साथ समाप्त
होने वाला नहीं हैं । इस परम् सत्य को जानना ही इस नश्वर संसार का सबसे बडा ज्ञेय
है । इस दृष्य संसार की भाँति वह परम् सत्य दृष्य नहीं है । इस परम् सत्य को जानना
विज्ञान एवं धर्म दोनों के लिये ही एक चुनौती है । इस परम् सत्य को खोजना किसी भी
दर्शन का विषय नहीं है फिरभी इसकी अनुभूति अपने अंत:करण में किये जाने के अनुभव से
इसे जानना धर्म दर्शन का विषय अवश्य है ।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)