परम् सत्य ने इस दृष्य संसार को
अपनी प्रकृति द्वारा बनाया और स्वयं उसमें आत्मा के रूप में बैठ गये । वह हम
प्रत्येक के हृदय में विद्यमान हैं । वही प्रकृति के गुणों के भोक्ता हैं । वही
हमारे हृदय में भक्ति भी जागृत करते हैं और वह ही हमारी प्रार्थना भी स्वीकार
करतें हैं । वह ही ज्ञान भी हैं और वह ही ज्ञान का पथ भी हैं ।
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