इस संसार की रचना में जहाँ एक ओर
परम् सत्य के मस्तिष्क की कल्पना नें एक साकार रूप धारण किया है वहीं दूसरी ओर
वहीं प्रगट रूपों का संसार परम् सत्य को जानने और उन्ही में समा जाने को उद्यत है
। परम् सत्य ही इस संसार के आदि मध्य और विलय तीनों ही रूप हैं । परम् सत्य ही
ज्ञान प्यार और पूर्णता तीनों ही रूप हैं । इन तीनों रूपों को अलग नही किया जा
सकता है । ब्रम्हा विष्णु और शिव तीनों एक ही रूप हैं मात्र समझने में भिन्न लगता
है ।
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