शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

परम् सत्य के दो रूप

                                        उपनिषदों में परम् सत्य को जहाँ एक ओर अविभाज्य, निर्विकार, अभेद्य, अ-चिंतनीय बताया है वहीं दूसरी ओर समस्त सृष्टि के स्वामी और समस्त रूपों का  उत्पत्ति श्रोत भी बताया है । इसके बावज़ूद भी वह गति से रहित है । परम् सत्य समस्त सृष्टि के मात्र आधार ही नहीं हैं अपितु इसके संचालक भी हैं । 

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

श्वेतस्वतरा उपपनिषद के अनुसार

परम् सत्य रूप रहित है परंतु अपनी माया शक्ति द्वरा समस्त रूपों को जन्म देने वाला है । पूरी ऋष्टि का उद्भव परम् सत्य से है और अंत में विलय भी उसी में है । हम उस परम् सत्य से विनय करते हैं कि हमें सत्कर्म करने का विवेक प्रदान करें । उन्हे कोई देख नहीं सकता परंतु जो उन्हे उपरोक्तानुसार अनुभव करता है, अपने मस्तिष्क में उनके प्रति आदर भाव पैदा करता है, उनको अपने हृदय में स्थिर कर जीवन यापन करता है वह दिव्य शांति को प्राप्त होता है । परम् सत्य हमारे अंत:करण में ज्योति के समान है ।  

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

सर्वभौम सत्य

परम् सत्य समस्त सृष्टि का सृजन-कर्ता परंतु इन सभी में से कोई नहीं, ना ही वस्तु, ना ही गुण, ना ही बुद्धि, ना ही विवेक, ना ही गति, ना ही जडता, ना ही स्थान और ना ही समय । परम् सत्य स्वयँ अपनी परिभाषा है । परम् सत्य रूप रहित है । परम् सत्य समय की उत्पत्ति के पूर्व से है ।

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

सत्य स्वरूप

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण नारद को अपना सत्य रूप बताते हुये कहते हैं कि मैं अ-दृष्य हूँ, गंध-रहित हूँ, मुझे स्पर्ष नहीं किया जा सकता है, गुण-रहित हूँ, मेरी विभक्ति सम्भव नहीं है, अजन्मा हूँ, शाश्वत् हूँ, चिर हूँ, और क्रिया से च्युत् हूँ | 

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

दैविक गतिविधियाँ

परम् सत्य की प्रकृति के साथ परस्पर क्रिया ही देवता के स्वरूप को जन्म देती है । यह संसार अर्थपूर्ण बन जाता है । इसकी रक्षा करना इसकी उन्नति करना लक्ष्य बन जाता है । 

रविवार, 26 अक्टूबर 2014

वेद के अनुसार

परम् सत्य अग्नि में है, जल में है, समस्त ब्रम्हाण्ड के कण कण में है, हम उन्हे बारम्बार प्रणाम करते हैं । यदि वह ना हों तो कौन कुछ कर सके, कौन जीवित रह सके, यह सब तभी सम्भव है जब परम् सत्य हैं । 

शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

तैत्रेय उपनिषद के अनुसार

परम् सत्य वह अस्तित्व है जिससे समस्त दृष्य जीव पैदा हुये हैं, जिसके सहारे समस्त जीव जीवित हैं, और समस्त जीव मरणोंपरांत जिसमें समाहित हो जाते हैं । 

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

व्यापक विस्तार

सर्वव्यापी परम् सत्य को जानने के लिये प्रचलित सांसारिक मानक प्रयोज्य नहीं प्रमाणित होते हैं । इस स्थिति को विद्वान लोग कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं निराकार, मस्तिष्क के विचार क्षेत्र से परे, अ-परिवर्तनीय । उसका कोई व्यक्त अस्तित्व नहीं है फिरभी सर्वत्र विद्यमान है । अविनाशी है फिरभी सभी विनाशशील रूपों में विद्यमान है । इस प्रकार के विरोधाभास वाले शब्दों का एक साथ प्रयोग करके यह व्यक्त करने का प्रयत्न किया जाता रहा है कि वह परम् सत्य ही समस्त रूपधारी के अस्तित्व का आधार है । परंतु सबका आधार होते हुये भी वह स्वयँ किसी अन्य पर आश्रित नहीं है । 

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

संतों द्वारा अभिव्यक्ति

गौतम बुद्ध से परम् सत्य का स्वरूप पूँछे जाने पर शांत मौन द्वारा उन्होने उत्तर दिया था । इसी प्रकार संत जेसुस से परम् सत्य को पूँछे जाने पर उन्होने भी शांत मौन द्वारा उत्तर दिया था । 

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

मध्यमिका बौद्धमत

यह सम्प्रदाय परम् सत्य को शून्य द्वारा व्यक्त करता है । इस अभिव्यक्ति का कारण व्यक्त करते हुये बताते हैं कि परम् सत्य को कोई भी नाम देने से उसके अपरिमित सामर्थ्य को सीमित व्यक्त करने का भय है जो कि भ्रामक होगा । । इस मतावलम्बियों का कहना है कि इस परम् सत्य को तभी पाया जा सकता है जबकि सभी द्वैत उस परम् सत्य में विलीन हो जाँय | 

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

बौद्धमत

निराकार परम् सत्य जिसका कि असत्य रूप पूरे संसार में फैला है जिसे दुनियाँ जानती है । जो सत्य को खोजने की राह पर चलता है उनमें जिन्हे सत्य का भास मिलता है वे उसे मौन द्वारा व्यक्त करते हैं । जिन्हें सत्य का भास नहीं मिलता वह प्रश्न-उत्तर करते हैं । चर्चा-प्रतिचर्चा से दूरी / विरक्ति इंगित होती है । चर्चा-प्रतिचर्चा अनउपलब्धि इंगित करती है । प्रचलित रूपों में कोई वस्तु मूल्य नहीं निहित होता है । इसलिये मौन चर्चा-प्रतिचर्चा की अपेक्षा उत्तम विकल्प होता है । मौन का रूपांतर भाषण में नहीं किया जा सकता है । इसलिये सत्य का अनुभव मिलने पर मूक ही बेहतर अभिव्यक्ति है । 

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

उपनिषदों की अभिव्यक्ति

जब तक ज्ञात संसार और अज्ञात ब्रम्ह की स्थिति रहती है तभी तक विचार भटकते रहते हैं । जब आत्मा की अनुभूति हो जाती है तब सोचने और भटकने वाला मस्तिष्क परम् सत्य की अनुभूति में समाहित हो जाता है । ऐसे में सोचने और भटकने को कुछ रह ही नहीं जाता है । परम् सत्य इतना निखरा हुआ सत्य है कि हम उसे एक भी नहीं कह सकते क्योंकि एक का भाव भी सांसारिक मानको पर आधारित है । हम उसे मात्र द्वितियो नास्ति कि उस जैसा कोई दूसरा नहीं अथवा अद्वैत कहकर व्यक्त करतें हैं । उसे तभी जाना जा सकता है जब सभी द्वैत उस एक में समाहित हो जाते हैं । ऐसे मे फिर नकारात्मक पथ अपनाते हुये परम् सत्य को व्यक्त किया जाता है । वह यह नहीं है । वह यह नहीं है । 

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

मूक ही अभिव्यक्ति

ब्रम्ह के अनुभव को व्यक्त करने के सामर्थ्य का अभाव अभिव्यक्त का उपाय ढूढते हुये कभी कहता है, एक अस्तित्व जो कि विशुद्ध और सरल है, तो कभी कहता है कि वह स्वयं विषय भी है और वस्तु भी है । सत्य स्थिति यह है कि हमारे पास परम् सत्य को व्यक्त करने के लिये कोई वृतांत नहीं है । इसलिये शाश्वत् मूक ही सबसे सही अभिव्यक्ति है जो कि हमारे व्यक्त करने की असहायता को प्रगट करने वाली है । परम् सत्य हमारी अभिव्यक्ति की सीमाओं से परे का अस्तित्व है । 

शनिवार, 18 अक्टूबर 2014

उपनिषदों का मत

उपनिषद जो कि वेदों की व्याख्या हैं का दृढ मत है कि समस्त सृष्टि का आधार परम् ब्रम्ह है । ब्रम्ह के समान कोई दूसरा नहीं है । ब्रम्ह को किसी निष्चित गुण से नहीं व्यक्त किया जा सकता है । ब्रम्ह किसी अन्य पर निर्भर नहीं है । ब्रम्ह किसी अन्य से प्रभावित नहीं होता है । मनुष्य में निहित आत्मा ब्रम्ह का ही अंश स्वरूप है । आत्मा का अनुभव एक ध्रुव सत्य जिसके अनुसार ज्ञात संसार और अज्ञात ब्रम्ह के एकीकृत स्वरूप की परिकल्पना है । इसके बावज़ूद भी ब्रम्ह का अनुभव व्यक्त करने के लिये मनुष्य का अभिव्यक्ति सामर्थ्य अपने को असहाय प्रतीत करता है| 

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

सत्य प्रश्नवाचक नहीं

इस परिवर्तनशील संसार में सभी कुछ समय के साथ समाप्त होने वाला है । किस भी स्वरूप का जन्म हुआ है उसका अंत निश्चित है । इस सत्य के बावज़ूद भी संसार का एक स्वरूप बना हुआ है । इससे विदित है कि इस संसार के पीछे तथा इस संसार के अंदर भी कोई ऐसा अपरिवर्तनीय सत्य भी निहित है जो कि समय के साथ समाप्त होने वाला नहीं हैं । इस परम् सत्य को जानना ही इस नश्वर संसार का सबसे बडा ज्ञेय है । इस दृष्य संसार की भाँति वह परम् सत्य दृष्य नहीं है । इस परम् सत्य को जानना विज्ञान एवं धर्म दोनों के लिये ही एक चुनौती है । इस परम् सत्य को खोजना किसी भी दर्शन का विषय नहीं है फिरभी इसकी अनुभूति अपने अंत:करण में किये जाने के अनुभव से इसे जानना धर्म दर्शन का विषय अवश्य है ।