परम् सत्य रूप रहित है परंतु अपनी
माया शक्ति द्वरा समस्त रूपों को जन्म देने वाला है । पूरी ऋष्टि का उद्भव परम्
सत्य से है और अंत में विलय भी उसी में है । हम उस परम् सत्य से विनय करते हैं कि
हमें सत्कर्म करने का विवेक प्रदान करें । उन्हे कोई देख नहीं सकता परंतु जो उन्हे
उपरोक्तानुसार अनुभव करता है, अपने मस्तिष्क में उनके प्रति आदर भाव पैदा करता है, उनको अपने हृदय में स्थिर कर जीवन यापन करता है वह दिव्य शांति को प्राप्त
होता है । परम् सत्य हमारे अंत:करण में ज्योति के समान है ।
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