उपनिषद जो कि वेदों की व्याख्या हैं का दृढ मत है कि समस्त
सृष्टि का आधार परम् ब्रम्ह है । ब्रम्ह के समान कोई दूसरा नहीं है । ब्रम्ह को
किसी निष्चित गुण से नहीं व्यक्त किया जा सकता है । ब्रम्ह किसी अन्य पर निर्भर
नहीं है । ब्रम्ह किसी अन्य से प्रभावित नहीं होता है । मनुष्य में निहित आत्मा
ब्रम्ह का ही अंश स्वरूप है । आत्मा का अनुभव एक ध्रुव सत्य जिसके अनुसार ज्ञात
संसार और अज्ञात ब्रम्ह के एकीकृत स्वरूप की परिकल्पना है । इसके बावज़ूद भी ब्रम्ह
का अनुभव व्यक्त करने के लिये मनुष्य का अभिव्यक्ति सामर्थ्य अपने को असहाय प्रतीत
करता है|
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