मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

बौद्धमत

निराकार परम् सत्य जिसका कि असत्य रूप पूरे संसार में फैला है जिसे दुनियाँ जानती है । जो सत्य को खोजने की राह पर चलता है उनमें जिन्हे सत्य का भास मिलता है वे उसे मौन द्वारा व्यक्त करते हैं । जिन्हें सत्य का भास नहीं मिलता वह प्रश्न-उत्तर करते हैं । चर्चा-प्रतिचर्चा से दूरी / विरक्ति इंगित होती है । चर्चा-प्रतिचर्चा अनउपलब्धि इंगित करती है । प्रचलित रूपों में कोई वस्तु मूल्य नहीं निहित होता है । इसलिये मौन चर्चा-प्रतिचर्चा की अपेक्षा उत्तम विकल्प होता है । मौन का रूपांतर भाषण में नहीं किया जा सकता है । इसलिये सत्य का अनुभव मिलने पर मूक ही बेहतर अभिव्यक्ति है । 

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