निराकार परम् सत्य जिसका कि असत्य
रूप पूरे संसार में फैला है जिसे दुनियाँ जानती है । जो सत्य को खोजने की राह पर
चलता है उनमें जिन्हे सत्य का भास मिलता है वे उसे मौन द्वारा व्यक्त करते हैं ।
जिन्हें सत्य का भास नहीं मिलता वह प्रश्न-उत्तर करते हैं । चर्चा-प्रतिचर्चा से
दूरी / विरक्ति इंगित होती है । चर्चा-प्रतिचर्चा अनउपलब्धि इंगित करती है । प्रचलित
रूपों में कोई वस्तु मूल्य नहीं निहित होता है । इसलिये मौन चर्चा-प्रतिचर्चा की
अपेक्षा उत्तम विकल्प होता है । मौन का रूपांतर भाषण में नहीं किया जा सकता है ।
इसलिये सत्य का अनुभव मिलने पर मूक ही बेहतर अभिव्यक्ति है ।
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