सर्वव्यापी परम् सत्य को जानने के
लिये प्रचलित सांसारिक मानक प्रयोज्य नहीं प्रमाणित होते हैं । इस स्थिति को
विद्वान लोग कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं – निराकार, मस्तिष्क के विचार क्षेत्र से परे, अ-परिवर्तनीय । उसका कोई व्यक्त अस्तित्व नहीं है फिरभी सर्वत्र विद्यमान है
। अविनाशी है फिरभी सभी विनाशशील रूपों में विद्यमान है । इस प्रकार के विरोधाभास
वाले शब्दों का एक साथ प्रयोग करके यह व्यक्त करने का प्रयत्न किया जाता रहा है कि
वह परम् सत्य ही समस्त रूपधारी के अस्तित्व का आधार है । परंतु सबका आधार होते
हुये भी वह स्वयँ किसी अन्य पर आश्रित नहीं है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें