सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

उपनिषदों की अभिव्यक्ति

जब तक ज्ञात संसार और अज्ञात ब्रम्ह की स्थिति रहती है तभी तक विचार भटकते रहते हैं । जब आत्मा की अनुभूति हो जाती है तब सोचने और भटकने वाला मस्तिष्क परम् सत्य की अनुभूति में समाहित हो जाता है । ऐसे में सोचने और भटकने को कुछ रह ही नहीं जाता है । परम् सत्य इतना निखरा हुआ सत्य है कि हम उसे एक भी नहीं कह सकते क्योंकि एक का भाव भी सांसारिक मानको पर आधारित है । हम उसे मात्र द्वितियो नास्ति कि उस जैसा कोई दूसरा नहीं अथवा अद्वैत कहकर व्यक्त करतें हैं । उसे तभी जाना जा सकता है जब सभी द्वैत उस एक में समाहित हो जाते हैं । ऐसे मे फिर नकारात्मक पथ अपनाते हुये परम् सत्य को व्यक्त किया जाता है । वह यह नहीं है । वह यह नहीं है । 

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