जब तक ज्ञात संसार और अज्ञात
ब्रम्ह की स्थिति रहती है तभी तक विचार भटकते रहते हैं । जब आत्मा की अनुभूति हो
जाती है तब सोचने और भटकने वाला मस्तिष्क परम् सत्य की अनुभूति में समाहित हो जाता
है । ऐसे में सोचने और भटकने को कुछ रह ही नहीं जाता है । परम् सत्य इतना निखरा
हुआ सत्य है कि हम उसे एक भी नहीं कह सकते क्योंकि एक का भाव भी सांसारिक मानको पर
आधारित है । हम उसे मात्र द्वितियो नास्ति कि उस जैसा कोई दूसरा नहीं अथवा अद्वैत
कहकर व्यक्त करतें हैं । उसे तभी जाना जा सकता है जब सभी द्वैत उस एक में समाहित
हो जाते हैं । ऐसे मे फिर नकारात्मक पथ अपनाते हुये परम् सत्य को व्यक्त किया जाता
है । वह यह नहीं है । वह यह नहीं है ।
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