शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

परम् सत्य के दो रूप

                                        उपनिषदों में परम् सत्य को जहाँ एक ओर अविभाज्य, निर्विकार, अभेद्य, अ-चिंतनीय बताया है वहीं दूसरी ओर समस्त सृष्टि के स्वामी और समस्त रूपों का  उत्पत्ति श्रोत भी बताया है । इसके बावज़ूद भी वह गति से रहित है । परम् सत्य समस्त सृष्टि के मात्र आधार ही नहीं हैं अपितु इसके संचालक भी हैं । 

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