सोमवार, 17 नवंबर 2014

परम् सत्य की लीलायें

यह संसार जिसकी रचना मैं-नही ( प्रकृति ) जो कि मैं ( आत्मा ) द्वारा गर्भित है के माध्यम से हुई है । इसमें प्रत्येक रूप की प्रकृति द्वारा सृजित गुणों के बल के अधीन उस स्वरूप के अधीन आत्मा अपना कर्म क्रियांवन धर्म निर्वाह करती है । इन आत्माओं को परम् सत्य अपनी सक्रीय प्रकृति द्वारा नियंत्रित करते हैं । इस समस्त लीला के गतिमान रहते हुये भी परम् सत्य का एक भिन्न रूप भी रहता है जो कि इन समस्त लीलाओं से पूर्णतया अ-प्रभावित रहता है । परम् सत्य संसार की समस्त नियोजित कर्मों को सम्पादन प्रदान करने वाला है परंतु किसी भी कर्म का कारण नहीं होता है । संसार की प्रत्येक गति को गतिमान करने वाला है परंतु किसी भी गति से उसका सरोकार नहीं होता है ।   

रविवार, 16 नवंबर 2014

परम सत्य स्वरूप

परम् सत्य पारलौकिक, अखण्ड, चिर ब्रम्ह है जो समस्त सृष्टि के आकाश और समय के चक्र में बँधे रूपों का आधार है । परमात्मा समस्त रूपों में विकीर्त आत्मा है । परमात्मा ही समस्त रूपों में निहित आत्मा, प्रकृति की गतिविधियों का नियंत्रक रूप तथा नये रूपों की उत्पत्ति का नियंत्रक है । वह पाप के अंधकार में भटकते को ज्ञान का प्रकाश देता है, निर्बल को शक्ति देता है, दु:ख भोगते को शांति और दया देता है, वह सभी का कल्याण करता है ।  

शनिवार, 15 नवंबर 2014

कृष्ण स्वरूप

जो सभी को आकर्षित करते हैं और अपने भक्तों के हृदय में भक्ति जाग्रित करते हैं वह कृष्ण हैं । उन्हे कृष्ण इसलिये कहा जाता है क्योंकि वह अपने भक्तों के पाप हर लेते हैं । कृष्ण कृस शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है खुरच कर साफ करना । कृष्ण अपने भक्तों के पाप को खुरच कर हटा देते हैं जिससे कृष्ण भक्त पाप से मुक्त हो जाता है । 

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

विष्णु स्वरूप

ऋगवेद में विष्णु की महिमा वर्णन करते हुये कहा गया है कि संसार की रचना करने के बाद वह स्वयं उसमें प्रवेश कर गये । वह संसार के नियंत्रक हैं और उसी संसार में समाये हुये हैं । विष्णु अपने अस्तित्व को परम् सत्य में समाहित रूप में रखते हैं । 

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

सृष्टि का विज्ञान



परम् सत्य के ही दो रूप, परा उच्चतर, अपरा निम्न । परा आत्मा, अपरा प्रकृति । आत्मा तथा प्रकृति निर्मित वस्तु शरीर जिसमें आत्मा को पिरोया दोनों ही परम् सत्य के ही दो रूप हैं । निराकार परम् सत्य ने अपने अद्भुद विज्ञान द्वारा अपने को साकार संसार के रूप में प्रगट किया है । इस संसार की रचना का विचार भी परम् सत्य के मस्तिष्क से उत्पन्न हुआ है और प्रकृति जिसके माध्यम से संसार को बनाया है वह भी उन्ही की रचना है । 

बुधवार, 12 नवंबर 2014

परस्पर एक साथ

इस संसार की रचना में जहाँ एक ओर परम् सत्य के मस्तिष्क की कल्पना नें एक साकार रूप धारण किया है वहीं दूसरी ओर वहीं प्रगट रूपों का संसार परम् सत्य को जानने और उन्ही में समा जाने को उद्यत है । परम् सत्य ही इस संसार के आदि मध्य और विलय तीनों ही रूप हैं । परम् सत्य ही ज्ञान प्यार और पूर्णता तीनों ही रूप हैं । इन तीनों रूपों को अलग नही किया जा सकता है । ब्रम्हा विष्णु और शिव तीनों एक ही रूप हैं मात्र समझने में भिन्न लगता है । 

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

उद्भव, रक्षा, संहार

परम् सत्य ही इस संसार को बनाने वाले हैं, वह ही इसकी रक्षा भी करते है,  और उन्ही में इस संसार का विलय भी होता है । संसार को बनाने के संदर्भ में उन्हे ही ब्रम्हा कहा जाता है, रक्षा करने के संदर्भ में उन्हे ही विष्णु कहा जाता है, और जब  सम्पूर्ण सृष्टि ज्ञान से युक्त हो जाती है तो उन्ही को शिव कहा जाता है । शिव रूप प्राप्त होना ही उनमें विलय है । ज्ञानी का कोई अलग स्वरूप नहीं रह जाता है । 

सोमवार, 10 नवंबर 2014

सृष्टि की रचना

परम् सत्य ने इस दृष्य संसार को अपनी प्रकृति द्वारा बनाया और स्वयं उसमें आत्मा के रूप में बैठ गये । वह हम प्रत्येक के हृदय में विद्यमान हैं । वही प्रकृति के गुणों के भोक्ता हैं । वही हमारे हृदय में भक्ति भी जागृत करते हैं और वह ही हमारी प्रार्थना भी स्वीकार करतें हैं । वह ही ज्ञान भी हैं और वह ही ज्ञान का पथ भी हैं । 

रविवार, 9 नवंबर 2014

संतुलन

प्रकृति अर्थात् बाह्य शक्तियों द्वारा संचालित व्यवस्था । आत्मा अर्थात् अ-परिवर्तनीय का अंश । इन्हीं दोनो का नियंत्रित परस्पर हर प्रत्येक को साधना है । जो जितना प्रकृति के जाल में उलझेगा उतना ही तनाव झेलेगा । जो जितना इस प्रकृति की कलाओं को अ-परिवर्तनीय के अंकुश में कर अपने कार्यों को करेगा उतना ही स्वतंत्रता की शांति का भोग करेगा । यही संतुलन ही जीवन का लक्ष्य है । 

शनिवार, 8 नवंबर 2014

नियम का शासन

प्रकृति नियम पालन करते हुये अनुशासित आचरण द्वारा कार्य सम्पादन की व्यवस्था है । प्रकृति की उत्पत्ति परम् सत्य के मस्तिष्क से निर्धारित योजना के अधीन हुई है । आत्मा परम् सत्य का अंश है । यह संसार इन्ही दोनो की परस्पर क्रिया का स्थल एवं परिणाम है । इसी परस्पर क्रिया को यथा अपेक्षा चरितार्थ करना हर प्रत्येक मनुष्य का दायित्व है । समय का चक्र चलता रहता है । हर कुछ समय के साथ बदलता रहता है । जो जितना इस चक्रपर सही का चुनाव करते हुये जीवन के कार्यों को करता जावेगा उतना ही सफलता पाता जावेगा । 

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

संघर्ष का संसार

यह संसार अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष का स्थल है । ईश्वर अपना प्यार हर एक के ऊपर उदारता से बरसाता है । इस प्यार के सहारे हर प्रत्येक को बुराई को दूर भगा अच्छाई को पाना है । ईश्वर निर्विवाद अच्छा है और उसका प्यार असीमित है । ईश्वर की शक्ति भी असीमित है । परन्तु बुराई को दूर करने के लिये हर प्रत्येक को प्रयत्नशील होना अनिवार्य है । ईश्वर जानता तो सभी कुछ है । बुराई पैदा करने वाली परिस्थितियाँ उसके सज्ञान से परे नहीं होती हैं । फिरभी बुराई से संघर्ष की शुरुआत हर प्रत्येक द्वारा ही अपेक्षित होती है ।

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

स्वतंत्र आत्मा

हर प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा समान रूप से स्वतन्त्र होती है । चुनाव भिन्न होते हैं इसलिये बुराई सम्भावित तथा घटित भी होती है । यदि चुनाव की स्वतंत्रता नहीं होगी तो संसार की घटनाये यंत्रवत् होंगी । यदि आदेशों द्वारा त्रुटि, भद्दगी, और बुराई के शमन की कवायद की जावेगी तो सच्चाई, सुंदरता और अच्छाई की खोज़ समाप्त हो जावेगी । यदि सच्चाई, सुंदरता और अच्छाई को पाना है तो त्रुटि, भद्दगी और बुराई का शमन करना होगा । 

बुधवार, 5 नवंबर 2014

अच्छे बुरे का चुनाव

इस कर्म प्रधान संसार में कर्म का चुनाव ही सबसे बडा मुद्दा है । ईश्वर को बुराईयों के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता है । ईश्वर आदेशों को किसीके ऊपर थोपता नहीं है । चुनाव हर प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है । परम् सत्य की अंश हर प्रत्येक आत्मा पूर्ण रूप से स्वतंत्र होती है । प्रकृति सभी को समान रूप से अवसर प्रदान करती है । ईश्वर का लक्ष्य सच्चाई, सुंदरता और अच्छाई का होता है । 

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

परम् ब्रम्ह और आत्मा

परम् सत्य अपने मूल स्वरूप में पवित्र परम् ब्रम्ह हैं । इस सृष्टि के जनक, नियंत्रक, एवं संचालक के रूप में ईश्वर हैं । परंतु दोनों ही रूपों में वह सृष्टि से भिन्न ही हैं । सृष्टि के संचालन के संदर्भ में यह आत्मा परम् सत्य की प्रतिनिधि है ।

सोमवार, 3 नवंबर 2014

भागवत् पुराण का मत

परम् सत्य अविभाजित सत्य के रूप में ब्रम्ह है । यही सत्य समस्त सृष्टि का आधार है । आत्मा उसी पूज्यनीय सत्य का ही स्वरूप है । परम् सत्य सृष्टि से सर्वथा भिन्न अस्तित्व है । सृष्टि में आत्मा को परम् सत्य ने अपने प्रतिनिधि के रूप में रखा है । आत्मा का कार्य सम्पादन में, कर्म से अ-प्रभावित, किसी अनुभव से परे, कर्मफल से अ-प्रभावित अपेक्षित स्वरूप होता है । इसी स्वरूप में यह सृष्टि की संचालक और नियंत्रक हो सकती है ।   

रविवार, 2 नवंबर 2014

परम् सत्य और आत्मा

परम् सत्य निरापद, निष्कलुश सृष्टि से परे एक स्वत: अस्तित्व है । उसी परम् सत्य ने अपनी माया शक्ति द्वारा अपने को समस्त सृष्टि के विभिन्न रूपों में प्रगट किया है । वह संसार की गतिविधियों से अ-प्रभावित भी रहता है जबकि वह समस्त गतिविधियों का संचालक भी होता है । आत्मा उसी परम् सत्य का ही अंश स्वरूप होता है ।

शनिवार, 1 नवंबर 2014

मनुष्य चरित्र के दो रूप

उपनिषदों में दो चिडियों का वृतांत आता है जो एक पेड पर बैठी हैं । इनमें से एक फल को खाती है और दूसरी फल को खाती नहीं केवल देखती है । यह चरित्र के दो पहलू के दृष्टांत हैं । हम परम् सत्य को किस रूप में देखते हैं यह चरित्र के विशिष्ट गुण का ज्ञोतक होता है । परम् सत्य को स्वामी के रूप में और अपने को सेवक के रूप में एक देखने का पहलू है और ईश्वर से कुछ माँगने के भाव में देखना दूसरा पहलू है ।