प्रकृति अर्थात् बाह्य शक्तियों
द्वारा संचालित व्यवस्था । आत्मा अर्थात् अ-परिवर्तनीय का अंश । इन्हीं दोनो का
नियंत्रित परस्पर हर प्रत्येक को साधना है । जो जितना प्रकृति के जाल में उलझेगा उतना
ही तनाव झेलेगा । जो जितना इस प्रकृति की कलाओं को अ-परिवर्तनीय के अंकुश में कर
अपने कार्यों को करेगा उतना ही स्वतंत्रता की शांति का भोग करेगा । यही संतुलन ही
जीवन का लक्ष्य है ।
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