सोमवार, 3 नवंबर 2014

भागवत् पुराण का मत

परम् सत्य अविभाजित सत्य के रूप में ब्रम्ह है । यही सत्य समस्त सृष्टि का आधार है । आत्मा उसी पूज्यनीय सत्य का ही स्वरूप है । परम् सत्य सृष्टि से सर्वथा भिन्न अस्तित्व है । सृष्टि में आत्मा को परम् सत्य ने अपने प्रतिनिधि के रूप में रखा है । आत्मा का कार्य सम्पादन में, कर्म से अ-प्रभावित, किसी अनुभव से परे, कर्मफल से अ-प्रभावित अपेक्षित स्वरूप होता है । इसी स्वरूप में यह सृष्टि की संचालक और नियंत्रक हो सकती है ।   

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