परम् सत्य अविभाजित सत्य के रूप
में ब्रम्ह है । यही सत्य समस्त सृष्टि का आधार है । आत्मा उसी पूज्यनीय सत्य का
ही स्वरूप है । परम् सत्य सृष्टि से सर्वथा भिन्न अस्तित्व है । सृष्टि में आत्मा
को परम् सत्य ने अपने प्रतिनिधि के रूप में रखा है । आत्मा का कार्य सम्पादन में, कर्म से अ-प्रभावित, किसी अनुभव से परे, कर्मफल से अ-प्रभावित अपेक्षित
स्वरूप होता है । इसी स्वरूप में यह सृष्टि की संचालक और नियंत्रक हो सकती है
।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें