यह संसार जिसकी रचना मैं-नही (
प्रकृति ) जो कि मैं ( आत्मा ) द्वारा गर्भित है के माध्यम से हुई है । इसमें
प्रत्येक रूप की प्रकृति द्वारा सृजित गुणों के बल के अधीन उस स्वरूप के अधीन
आत्मा अपना कर्म क्रियांवन धर्म निर्वाह करती है । इन आत्माओं को परम् सत्य अपनी
सक्रीय प्रकृति द्वारा नियंत्रित करते हैं । इस समस्त लीला के गतिमान रहते हुये भी
परम् सत्य का एक भिन्न रूप भी रहता है जो कि इन समस्त लीलाओं से पूर्णतया अ-प्रभावित
रहता है । परम् सत्य संसार की समस्त नियोजित कर्मों को सम्पादन प्रदान करने वाला
है परंतु किसी भी कर्म का कारण नहीं होता है । संसार की प्रत्येक गति को गतिमान
करने वाला है परंतु किसी भी गति से उसका सरोकार नहीं होता है ।
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