प्रकृति नियम पालन करते हुये
अनुशासित आचरण द्वारा कार्य सम्पादन की व्यवस्था है । प्रकृति की उत्पत्ति परम्
सत्य के मस्तिष्क से निर्धारित योजना के अधीन हुई है । आत्मा परम् सत्य का अंश है
। यह संसार इन्ही दोनो की परस्पर क्रिया का स्थल एवं परिणाम है । इसी परस्पर
क्रिया को यथा अपेक्षा चरितार्थ करना हर प्रत्येक मनुष्य का दायित्व है । समय का
चक्र चलता रहता है । हर कुछ समय के साथ बदलता रहता है । जो जितना इस चक्रपर सही का
चुनाव करते हुये जीवन के कार्यों को करता जावेगा उतना ही सफलता पाता जावेगा ।
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