परम् सत्य निरापद, निष्कलुश सृष्टि से परे एक स्वत: अस्तित्व है । उसी परम् सत्य ने अपनी माया
शक्ति द्वारा अपने को समस्त सृष्टि के विभिन्न रूपों में प्रगट किया है । वह संसार
की गतिविधियों से अ-प्रभावित भी रहता है जबकि वह समस्त गतिविधियों का संचालक भी
होता है । आत्मा उसी परम् सत्य का ही अंश स्वरूप होता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें